Showing posts with label mohabbat. Show all posts

Thursday, 10 October 2013

वो ख्वाब अगर है तो, बिखर क्यूँ नही जाता ...



बेनाम सा ये दर्द, ठहर क्यूँ नही जाता,
जो बीत गया है वो , गुज़र क्यूँ नही जाता,

वो एक ही चेहरा तो नही सारे जहाँ में,
जो दूर है वो दिल से उतर क्यूँ नही जाता,

मैं अपनी ही उलझी हुई राहों का तमाशा,
जाते हैं जिधर सब, मैं उधर क्यूँ नही जाता,

वो नाम है बरसों से, न चेहरा न बदन है,
वो ख्वाब अगर है तो, बिखर क्यूँ नही जाता 




                                                                                                   --   आशीष (जो लिखता है दिल से )
Read More

Saturday, 11 May 2013

टूट पड़ते हैं सब, फंसा शिकार देखकर..........




जमाने के घिनौने कारोबार देखकर ,
मैं खुश हूँ खुद को बेरोजगार देख कर । 

गली गली इंसानियत शर्मसार देखकर ,
जलता हूँ अपनी ताकत-इ-दीदार देख कर । 

ढूढ़ने गया था उस भीड़ में आदमी ,
लौट आया बुत दो चार देखकर । 

सुना है की मोहब्बत इस शहर में रहती थी ,
छुप गयी ... हर हाथ में हथियार देखकर । 

लगता है उसने भी ठिकाने बदल लिए ,
बद-दुआओं की लम्बी कतार देखकर । 

सोचता था की मैं भी तेरे हो साथ चलता ,
थम गए मगर कदम , रफ़्तार देखकर । 

कौन देखता है यहाँ मजबूरियों को ,
"टूट पड़ते हैं सब, फंसा शिकार देखकर "॥॥॥ 


                                                            --   आशीष (जो लिखता है दिल से )


Read More